Wednesday, May 23, 2012

Nana ji Ka badbadana / नाना जी का बडबडाना



  याद है वोह बचपन के दिन जब नाना जी हमें घोडा बन कर अपनी पीट पे गुमाते थे , हमे हसते थे , सैर पे ले जातें थे !  कभी सच्ची तो , कभी बनावटी कहानिया सुनाते थे ! हमारे साथ वोह भी बच्चे बन कर नानी को सताते थे !

  वक़्त कितनी रफ़्तार से आगे बढ रहा है की जैसे वोह सारी शेतानियाँ मस्ती कहीं खो सी गई है, और ऐसे ही नाना , नानी जी के चेहरे से वोह हमारे बचपन की ख़ुशी कही खो सी गई है।. 

  जैसे जैसे हमारे बचपन कहीं खो सा गया है वैसे ही उनका वोह बचपन कहीं खो सा गया है।
और बुदापे की परेशानियाँ बच्चो का भविष्य, उनकी ख़ुशी और शादी जैसे मानसिक तनाव
से भर गई है, कुछ चीज़ेऐसी है जो शायद वोह किसी के साथ बाटना नहीं चाहते और खुदसे
ही बात करउसका हल सुल्जाने लगे है  

  अप्रैल की बात है जब मैं अपने परिवार से साथ दक्षिण भारत के गुमने गई थी! नाना जी भी साथ आये थे ! जिस दिन हम दिल्ली से रवाना हो रहे थे उससे अक दिन पहले ही मेरे चचेरे  भाई की किसी के साथ लड़ाई हो गई जिसकी वजह से उसके पीट पे 18 टांके लगे थे. बस वोह बात उनने परेशान किये जा रही थी। दिन में तो सब ठाक  था  पर जैसे जैसे रात हो
 रही थी वैसे वैसे सब तक चुके थे और सफ़र लम्बा ता थो सब सोने की तयारी करने लगे ट्रेन में !

  तब नाना जी सोने की बजाये खिड़की पे बीते अपने आप से बातें करने लगे तब मम्मी की नज़र नानाजी पर पड़ी और वोह उनने देख कर रोने लगी।जैसे ही मैंने मम्मी को देखा थो वोह नाना जी तरफ इशारा करने लगी थो मैंने देखा नाना जी अपने ही आप में बद्बने लगे , हाथो से इशारा कर जैसे कह रहे हो की " कितनी बार कहा ठाट उस लड़के को की ऐसे लडको से दूर रहे , अब ऐसी हालत हो गई है की उठ भी नहीं पा रहा है अब पता नहीं क्या होगा "!

  उनको ऐसे बातें करते देख, मम्मी को उनके लिए परेशां होता देख मेरी भी ऑंखें नम  हो उठी  , लगा की हमारे माँ बाप , नाना नानी , दादा दादी कितने परेशां होते होंगे हमारी उलटी सीडी हरकतों से। 

  पता नहीं कब तक येया लोग हमारे साथ है और जब सब परेशानियों से मुक्त होकर सुकून से
जीना का वक़्त आया तो वोह खुश नहीं है, दुखी है हमरे लिए , हमरे भविष्य को लेके !!

  उन्होंने हमें इतनी खुशिया दी हमारे ख्याल रखा , और हम उने क्या दे रहे है ? आप भी सोचिये जरा आप लोग उनको उनके बराबर थो नहीं पर क्या कोई ख़ुशी दे रहे है ? नहीं थो देने शुरू कीजिये पता नहीं ये पल , ये वक़्त , ये अपनापन कब आपके हाथो से निकल जाए  और आप अफ़सोस करते रह जाए !!!

लेखिखा
"दिव्या"



Friday, November 18, 2011

तुम मुस्कराओ , दुनिया तुमरे संग मुस्कराएगी !

 


  ज़िन्दगी में कई बार ऐसी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है जो हमने कही सोचा भी नहीं होता.. कई बार मंजिल एक ऐसी राह में ले जाती है जहाँ शायद हमने कभी जाने की सोची भी नहीं थी...

  पर क्या ऐसे रास्तो से हमें वापस आ जाना चाहिए ? या फिर उन मुस्किलो से लड़ना चाहिए ?

  हम लोग ज़्यादातर ऐसे वक़्त  में अपने दिल से काम लेते है ! दिमाग की जगह , कभी कभी ऐसा करना सही भी होता है पर कभी कभी दिल आपको इतना कमज़ोर बना देता है की हर पर आपको अपना फैसला गलत लगता है! क्यूंकि ऐसे मोड़ पे आप सिर्फ अपने नहीं दुसरो के बारे में भी सोचने लगते है , कहीं उसे बुरा लगा , कभी उने तकलीफ हुई थो ?, कहीं कुछ गलत न हो जाए, मैं वापस लौट जाऊं ...क्या मैं जो कर रहा / या कर रही हूँ  वोह सही है भी की नहीं...


   ऐसा दौर ज़िन्दगी में सबके पास आता है है , क्यूंकि येया दुनिया एक रंगमंच है , जहाँ एक अकेले इंसान की हर तरह के किरदार निबाने पड़ते है ! कभी कभी एक ही किरदार की इतनी आदत हो जाती है, की लगता है की कोई और किरदार न मिले !

  जैसे की ख़ुशी , लोगो को खुशियों की आदत हो जाती है , फिर लगता है दुःख कभी न आये , और जब दुःख आता है तब वोह इंसान खुदको कसूरवार समजता है, अपने आप को इतना निराश कर लेता है की जो ख़ुशी आणि वाली भी हो वोह और दूर हो जाती है!

  इसलिए आजकल लोगो के मन में एक दुसरे के लिए नफरत जायदा है , प्यार कम ! लोग एक दुसरे पे लांचन लगते है, मरते पीठ करते है, कोई ख़ुदकुशी कर लेता है! छोटी छोटी बाते भी अक दुसरे की इतनी कडवी लगती है की वोह दोस्ती की दुश्मनी में बदल जाते है! हर तरह , हर जगह सिर्फ और सिर्फ नफरत नज़र आती है !

  ऐसे में क्या किया जाए ? कैसे इस नफरत को शांत किया जाए ? जैसे एक दोस्त से दुसमन बने लोगो को फिर से दोस्त बनाया जाए ? पूजा पाठ करके ? जादू टोना करके ? या फिर इस उम्मीद में ज़िन्दगी गुज़ार दो की कुछ नहीं हो सकता , और न कभी होगा ?


  सुना है दुनिया ख़तम होने वाली है ? २०१२ में !, उस वक़्त का मैंने ऐसे ही स्मरण किया , और मुझे ऐसा दृश्य नज़र आया की जितने दुसमन है दोस्त है वोह एक हो गए , सब के दिल में एक दुसरे के लिए अचानक प्यार उमड़ आया, लोग जिन्होंने ज़िन्दगी में कभी बात न करने की कसम खाई थी वोह अक दुसरे का हाल पूछने लगे , सब ने मिल के दुआ की , जो एक दुसरे को मरना चाहते थे , वोह उनकी लम्भी उम्र की दुआ करने लगे.. सब जगह सिर्फ प्यार ही प्यार नज़र आ रहा था..

  शायद ऐसा ही कुछ होगा जब ऐसी कोई घडी आएगी.. जानते हो क्यूँ वोह एक ऐसा दिन होगा जब हमें पता होगा.. की कल के बाद हम उस इंसान से , दोस्त से या दुसमन से , भाई से बहिन से , माँ , बाप , रिश्तेदार से किसी से भी नहीं मिल पायेगे.. वोह दर्द, प्यार की शकल लेगा...

  कुछ समझे ?

  जी हाँ ! अगर एक दुसरे के दिल में जहाँ पानी है , नफरत मिटानी है थो हमें हर पल ऐसे जीना चाहिए , जैसे ये हमारा आखिरी पल है कल क्या होगा वैसे भी किसी को नहीं पता, कल मिलेंगे या नहीं कोई नहीं जनता ! इसलिए हर पल को ऐसे इससे सुंदर और अच्छा पल कभी नहीं आएगा तुमारी ज़िन्दगी में. सब दोस्त है , सब से प्यार से मिलो, क्या पता तुमरे अच्छे करम तुमरे खाते में जुड़ जाए जब तुम ऊपर जाओ.. और क्या पता तुमारी तरफ से दी हुई ख़ुशी किसी और की ज़िन्दगी में भी खुशियाँ ला दे ! ..

  इसका एक उदहारण बचपन से भी दिया जा सकता है.. जब हम छोटे थे तो लड़ते थे जागते थे पर कुछ ही पल में मान जाते है ! अक ही पल में हर कडवाहट मिटा देते है थे.. बचपन के दिन वापस नहीं आ सकते पर वोह अक आदत वोह साथ ले कर आई जा सटी है ना ?


  "कहते है तुम मुस्कराओ  , दुनिया तुमरे संग मुस्कराएगी !"


लेखिखा
" दिव्या "









Wednesday, June 2, 2010

Zindgai

ज़िन्दगी कितनी करवट बदलती जाती है
हर मोड़ पे एक नई राह लिखती जाती है
सोचते है के अब संभलेगी ये ज़िन्दगी
पर ये तो हर बार भिखरती जाती है  !!!!

कभी कभी क्यूँ ऐसा लगता है की ज़िन्दगी ढेर सारी खुशियाँ दामन में भर देगी फिर पलक जपकते ही वोह सारी खुशिया गम में बदल जाती है !
जब कभी मन गबराता है तो ऐसा लगता है की शायद भगवान् ने सारे गम हमारे ही हिस्से भर दिए है... उस वक़्त न दिल काम करता है न दीमाग... सब अपनी ही दिशा में भाग रहे होता है... सही क्या है गलत क्या है कुछ समाज नहीं आता .. लगता है तेज़ तूफ़ान ने जैसे चलती हुई ज़िन्दगी को अपने आगोश में भर के उसकी रफ़्तार पे रोक लगा दी है...

लोगो पर से भरोसा उठ जाता है... एक इंसान एक साया सा नज़र आता है जो अँधेरा होते ही तुमारा साथ छोड़ देता है... अकेला बेबस सा छोड़ देता है जहाँ पर कोई अपना पराया नहीं होता ... न ही वोह साया उस अंधियारे में तुमारी तरफ आने की कोशिश करता है...

क्यूँ ?  इस क्यूँ के सिवा कोई और प्रश्न ज़ेहन में नहीं आता , लगता जैसे तुमरे मन मा आस जगा कर तुमसे सब कुछ चीन लिया हो.. जैसे भूक से भिलकते बच्चे को खाना दिखा कर छीन लेना...

पर जानते है ये सारे धुक एक पल में गायब हो जाते है जब हमसे भी ज्यादा धुकी होता है... इसलिए... जब भी दुख हो जब भी तकलीफ हो.. एक बार अपनी आँखे बंद करके किसी ऐसे व्यक्ति या ऐसे इंसान के बारे मा सोचना जो तुमसे भी जयादा तकलीफ में हो.. तुमरे दुःख उसके सामने छोटा लगने लगेगा और तुमको हिम्मत मिलेगी अपनी तकलीफों से लड़कर उभरने के लिए...


अपना ख्याल रखना...!
दिव्या !

Friday, February 5, 2010

हमारी माँ को मत बाटों !!!


भारत को आज़ाद हुए साल हो गए पर क्या सही माएने में देश आज़ाद है ? नहीं ! जी हाँ आज भी देश को असामाजिक तत्वों ने अपने जाल में इस कदर जकड रखा है की मासूम लोग भी इसके नापाक इरादों से बच नहीं पाते ! जो सरकार चला रहे है वोह खुद इसके प्रभाव से बच नहीं पाते और न सरकार को खड़ा करने वाले आम लोग... कभी भष्टाचार , तो कभी देश को टुकडो में बांटने वाले जाती धरम के ठेकेदार !

हर कोई यहाँ सिर्फ अपने बनाये नियमो पे चलना चाहता है , चाहता है की सामने वाला व्यक्ति भी उसकी पूजा करे और उसके बताये रस्ते पर चले .. मेरा देश मेरा वतन करने वाले लोग ही सबसे पहले अपने पैर पीछे खींच लेते है जब देश में कोई मुसीबत को आपदा आती है तो ! तब ये कायर लोग सामने क्यूँ नहीं आते ? क्यूँ ?

" सामना " ये ब्लॉग एक ऐसी व्यक्ति की करतूत बयान करता है जो खुद कुछ नहीं कर सकता , कुछ बाला नहीं कर सकता और देश में आये दिन बटवारे जैसे कारको को सामने ला ला कर देश के लोगो के अंदर एक दुसरे के प्रति हीन भावना पैदा करने की पूरी कोशिश कर रहा है...

भारतवर्ष में सबका एक सामान अधिकार है सबको साथ चलने , हर धर्म , भाषा का प्रोग करने का पूर्ण अधिकार है फिर क्यूँ ऐसे लोगो की बातें मुंबई के लोग सुन रहे है ? क्यूँ ? क्या उनके मन में इतना कॉफ़ समां गया है या फिर वोह देश को बातें वाली सोच को सही मानते है ? या फिर वोह ये सोच रहे है की जो हो रहा है होने दो ये कभी रुकने वाला नहीं.. आज ये चुप होगा तो कल कोई और ऐसी आसामाजिक बातें दोहराएगा ?

इन् जनाब की बात को एक तरफ़ा रख दे तो दूसरी तरफ राज्यों को अलग नाम देने की बातें सामने आ रही है जैसे की तेलन्गाना मामला सामने आया फिर उतर प्रदेश को अलग अलग राज्यों में बाटने की बातें !

देश वैसे ही अनेक उल्जनो से जुन्ज रहा है ऊपर से ये आतंरिक मामले सुलाजाने के बदले और बढ रहे है.. अगर देश सारी सुरक्षा देश के अंदर की लगा देगा तो पडोसी राज्यों से हो रहे हमलो की सुरक्षा क्या ये देश को बाटने वाले लोग करेंगे....

जब चल रही होंगी देश में गोलिया बह रहा होगा हर तरफ खून  ही खून तब ये क्या घोड़े बेच कर सो जातें है ? तब क्यूँ नहीं सामने आते ये समाज के ठेकेदार ? क्यूँ? क्यूंकि ये कायर है बस लोगो की भावनाओं के साथ खेलना आता है इनको , चाहे उन् भावनाओं में बह लोग एक दुसरे की जान ही क्यूँ न ले ले इनको कोई फरक नहीं पड़ेगा...

देश में अनेक समस्याए पहले से ही है सबसे बड़ी तो "ग्लोबल वार्मिंग" जिसके लड़ने के लिए पूरा विश्व आगे बढ रहा है , ये ठेकेदार देश को इस समाया से लड़ने की प्रेरणा क्यूँ नहीं देते ? देश में बेरोजगारी बढ रही है फिर ये ठेकेदार लगू उद्यूग या अनय बेरोजगारी को मिलाने वाले सन्देश क्यूँ नहीं देते ? देश में आज भी कोई लोग भूक से भिलाकते रहते है ये ठेकदार उस भूक को मिटने के बारे में क्यूँ नहीं सोचते ? देश में कूड़ा करकट हर तरफ फेल रहा है ये देश में साफ़ सफाई रखने का संदेश क्यूँ नहीं देते ? क्यूंकि ये जानते है बुराई अचाई से पहले प्रभाव डालती है ... फूट डालो और शासन करो बस यही नियम है इनका...जो कभी किसी का भला नहीं सोच सकते ...!!

सरकार को इन लोगो के ब्लॉग को कारिज कर देना चाहिए ताकि ये लोग और कोई ऐसी हरकते या ऐसे संकेत न दे की देश की जनता आपस में लड़  मरे....

ये भारत हमारी माता है हमारी माँ ! जो हमें खिलाती है हमें अपने में संजोये है ? फिर हम अपनी माँ को केसे अलग कर सकते है ? बचा लो अपनी माँ को .. लिखो ब्लॉग अपने देश में पनप रहे ऐसे असामाजिक तत्वों को मिटने के लिए ... छोटी छोटी कोशिश आगे चल कर मुकाम जरुर हासिल करेगी... !

जय हिंद!
लेखिखा
" दिव्या"

Thursday, January 7, 2010

मीठी सी मुस्कान थी उसकी..

    मीठी सी मुस्कान थी उसकी ,आँखों में अक अजीब सी कशिश थी , मानो कुछ कहना चाह रही थी वोह अपनी जुबान से उसकी मासूमियत ने मेरे दिल में एक अनचाही सी उम्मीद एक खवाब सजा दिए ...
    रंग उसका ऐसा था जो हर भाव में एक मीटास लिए था , एक जादू था उसमे जैसे किसी ने चन्दन की लकड़ी से उसका ये रूप सजाया हुआ है और फूलो सी खुसबू उसके तन में भर दी हो...
    किसी परी से कम नहीं थी वोह ! उसका धीरे से पलके जपकना, खिलखिलाना और बहूत ही प्यार से मेरी उंगली को तामना और फिर से मुस्कराना ... मानो मेरे अदूरेपन को  हर पल पूरा कर रहा हो , मुझसे कह रहा हो , मुझे खुद से कभी अलग मत करना , हर पल मेरे संग रहना ... जी तो कर रहा था की दुनिया भर की खुशियाँ उसके दामन में भर दूं , उसका गम मैं ले लूँ और उसके दमन में खुद के खवाबो को निछावर कर दूँ ...
    अपने प्यारे से छोटे छोटे कदमो से वोह मेरी और बड़ी और आकर मेरी गोद में बैठ कर उसने धीरे से अपनी कोयल जैसी आवाज़ में कहा "माँ" ..और फिर मुस्कराने लग गयी...
    उसकी खिल्कारी में मैं ऐसी डूबी की मेरी आँखे खुल गई और मैं सपने से हक्कीकत में लौट आई ... एक लम्बी सी आह भरी और फिर से उस सपने में लौट जाने की कोशिश की ... पर जा न पाई...
    वोह पल ज़िन्दगी से अनमोल पल सा होकर रह गया... शायद एक याद एक झरोका बन कर...
    ये सपने भी न कभी कभी क्या क्या रंग दिखाते है... कभी हसते है तो कभी रुलाते है...और कभी कभी एक अजीब सी , मासूम सी ... ख्वाइश झोली में भर जाते है...

लेखिखा
"दिव्या"

Tuesday, December 29, 2009

ज़िन्दगी खफा खफा सी लगती है !



 
ज़िन्दगी खफा खफा सी लगती है ,
मौजो की रवानी आज बेवफा सी लगती है,
बंद थे जो सच किसी पन्ने किसी किताब में,
आज वोह कहानी अनजानी सी लगती है !!

ज़िन्दगी क्या क्या रंग दिखाती है, कभी हसती तो कभी रुलाती है... ऐसे ही कुछ काली स्याही से लिखे अरमान जो अरमान ही रह गए और कुछ ऐसे भी लोग थे जो साथ चलते थे पर आज मुस्किल मोड़ पे अनजान हो गए...

साल मनो सुरु ही हुआ और अब ख़तम होने को है... पर ये अंत उन् गुज़ारे सालो जैसा नहीं है ,.. कुछ कडवाहट है कुछ बातें है जो दिल से बहार आने को उतावला हो रहा है पर क्या करे कमबख्त ये दिल न समाज है ..ना जाने क्यूँ सच जानते हुए हुए बी अनजान बना हुआ है... क्यूँ क्यूँ नहीं कह प् रहा है अपने दिल का हाल ? किस वक़्त के इंतज़ार में है...? जाने क्यूँ ये आज चुप है ... शायद नहीं चाहता की किसी और को तकलीफ दे.... नहीं चाहता शायद जिनकी वजह से आज बेचन है, उदास है उनको चोट पहुचाये...

आज नजाने क्यूँ ऐसा व्यतीत हो रहा है जैसे जो कल तक साथ चल रहे थे आज अचानक उन्होंने अपना रास्ता बदल लिया..या जान कर भी अनजान हो गए है...जैसा अब व्यतीत हो रहा है पहले कभी क्यूँ ना हुआ ,,,

क्या भरोसा करना गुनाह है ? हाँ तो क्यूँ ? नहीं तो भी क्यूँ ?? क्यूँ ? शायद इस का जवाब आप भी दूंद रहे होंगे... क्यूँ इंसान की ज़िन्दगी में ऐसे सवाल उठ कड़े हो जाते है जिन सवाल का जवाब नहीं होता ... क्यूँ साथ चलने वाले दोस्त भी अनजान हो जाते है क्यूँ?...

आज मैं इन् सवालों के घेरे में इस कदर घिर चुकी हूँ की मुझे दूर तक कोई रास्ता नज़र नहीं आ रहा है .. दूर दूर तक कोई अपना नज़र नहीं आ रहा है... आज अकेली हूँ मैं...हाँ अक दम अकेली...गुमनाम काले भवंडर में मुझे अपने चक्कर में जो कैद किया सब अपने दूर भाग गए मुझे यहाँ अकेला छोड़ कर...

क्या करूँ , क्या न करूँ... कुछ समाज नहीं आ रहा .. बस आज यही चाहती हूँ खुदा से के दिल के घाव जल्दी से भर जाए और वक़्त इस गाव के निसान को मिटा दे ताकि कोई भी कलिश बाकी न रहे वरना ज़िन्दगी जीना मुमकिन ना होगा...

लेखिखा
"दिव्या"

Thursday, December 17, 2009

हमारा भाग्य हमारे हाथो में है!

भाग्य - आज शायद बहूत सारे भाग्य को मानते है , अपनी जीवन की हर कड़ी को भाग्य से जोड़ते हुए अपने आने वाले कल का फैसला करते है! आज हर कोई अपने भाग्य से लड़ना चाहता है वोह चाहता है की उसका भाग्य उसका साथ हर जगह दे... परन्तु क्या आप जानते है ? भाग्य क्या है और इसका फैसला कैसे होता है...

मैं यहाँ कुछ ऐसी बातों का वर्णन करने जा राइ हूँ जिस बात से कुछ लोग सहमत होंगे पर कुछ नहीं...

भाग्य शब्द से अभिप्राय है जो कुछ भी बागवान लिखा है बाले ही अच्छा हो या बुरा ! परन्तु मैं यह नहीं मानती, भगवान् ने हमारे भगाया लिखा है  पर वोह हमारे जनम और मरण तक सीमित है. ( मैं यहाँ धर्म से जुडी बातों का वर्णन नहीं कर रही और न ही करना चाहती हूँ मैं एक इन्सान की नजरो से जो महसूस किया है बस उन् बातों का आपके समक्ष रख रही हूँ !

जैसे मैंने ऊपर लिखा है मरण और जीवन भगवान् ने लिखा है परन्तु हम अपने जीवन में कैसा मुकाम पायेंगे ये हमारे हाथों में है... कोई गरीब होता है तो कोई अमीर लेकिन इसका मतलब ये नहीं की गरीब अमीर नहीं बन सकता और अमीर गरीब नहीं... जहाँ तक मैंने सुना और पड़ा ये देखा है ये जाना है वोह ये की आज जितने लोग कामयाब है उनमे से अधिकतर लोग निम्न स्तर से उच्च स्तर की और गए है जो भी जीवन वोह आज जी रहे है वोह उन्होंने खुद अपने लिए अपने अंतर्मन से चुना है!

जब भी हम गलत होते है हाँ भगवान् हमें सही राह दिखाते है पर उस इस्शारे को समझ के अपना और उसको अनदेखा करना इंसान के हित में ही होता है ...

एक कहानी सुनाती हूँ :- ( शायद आपने कभी सुनी होगी !)

एक बार एक गाव में बाद आ जाती है सब लोग नाव की मदद से सुरक्षित स्तान पर जाने लगते है परन्तु एक व्यक्ति नहीं जाता और अपने घर की पहली मंजिल में चढ़ जाता है..जब लोग उसके घर के बहार से नाव की मदद से दूसरी जगह जा रहे होते है तो उसको कहते है - भाई चलो बाढ़  नहीं रुकने वाली - तो वोह कहता है - मैं नहीं जाऊंगा भगवान् बचायेंगे ...( फिर वोह गाव वाले चले जाते है ) ... बाढ़ का पानी और ऊपर बढता है तो वोह व्यक्ति घर की दूसरी मंजिल में चढ़ जाता है - गाव वाले फिर बुलाते है - वोह फिर कहता है मैं नहीं आऊंगा मुझे भगवान् बचायेंगे... ( फिर गाव वाले चले जाते है ) ...बाढ़ का पानी और बढता है और वोह व्यक्ति अपने घर की तीसरी मंजिल में चढ़ जाता है - फिर गाव वाले उसको बुलाते है - वोह फिर मना कर देता है और कहता है भगवान् मुझे बचायेंगे...( गाव वाले फिर चले जाते है ) - बाढ़ का पानी और बढता है और वोह व्यक्ति अपना जीवन खो देता है ---

इस कहानी से मैं ये कहना चाहती हूँ की भगवान् ने उसके जीवन का अंत नहीं लिखा था परन्तु भगवान् के बार बार दिए मौके को अनदेखा कर उसने खुद अपने लिए ऐसा भाग्य चुना जिससे उससे अपनी ज़िन्दगी खो दी...

इसी प्रकार हमारा भाग्य हमारे हाथों में होता है अपने अपनी सूझ भूझ से अपने सामने आने वाले मौके को पहचानना चाहिए और अपने जीवन की  लक्ष्य की और निरंतर बड़ते रहना चाहिए...

हमारा भाग्य हमारे हाथो में है चाहे तो हम इसे बिगाड़ सकते है या तो सवार सकते है...शांत मन हमें अपने भाग्य को सवारने में हमारी मदद करता है है...

क्या कहते है आप ?

लेखिखा 
दिव्या    



Friday, December 11, 2009

सीखना और सीखाना - जीवन की दो क्रिया

दुनियां बहूत बड़ी है और इस दुनियां में बहूत सारे लोग है जो अलग अलग काम करते है पर जानते है सबके ही मकसद है ? जी हाँ सही पढ़ा आपने ही मकसद दो ही लक्ष्य और वोह है – “सीखना और सीखाना”

सीखना और सीखाना ये दोनों ही शब्द एक ही शब्द से सुरु होते है वोह है “सीख”। सीख से अभिप्राये है अनुभव ।


अनुभव का प्रोयोग मैंने यहाँ इस कारण वर्ष किया है क्युंकी किसी भी प्रकार के ज्ञान का अनुभव कोई भी जनम जात नही पता है … ये भी एक प्रक्रियां है जिसमे मनुष्य की जिज्ञासा उसको प्रेरित करती है अनुभव प्राप्त करने के लिए…

सीखना हर व्यक्ति चाहता है और जो सीखने की प्रक्रिया में थोड़े आगे बढ जाते है वोह सीखना शुरू करते है…

आज हम सब किसी भी कार्य से क्यूँ न जुड़े हो हम ये दोनों क्रिया करते है.. सीखते है और सीखते भी है…

उदाहरण के लिए :-
१)जैसे हमरे माता पिता ने अपने माता पिता से सीखा और फ़िर हमें सीखने लगे ,आगे हम अपने आने वाली पीढ़ियों को सीखाएँगे ...


२) जैसे किसी कंपनी का मालिक पहले ख़ुद सीखता है फ़िर अपने करमचारियों को सीखता है …

परन्तु सीखने और सीखने की प्रक्रिया में इंसान अपने आप पर गुरुर करने लगता है वोह सीखाने तो लग जाता है पर आगे सीखना नही चाहता ऐसी में इंसान अपने निम्न स्तर में पहुँच जाता है जहाँ से उसने सीखना शुरु किया था …

हम सबी जानते है कोई भी कभी भी सम्पूर्ण नही बन सकता है… जैसे जीवन की पहली सीढ़ी हो या आखिरी इंसान सम्पूर्ण नही होता वोह शुरु से अंत तक इन दो (सीखने और सीखाने ) की प्रक्रिया में ही रहता है…

इसलिए हमें अपने अनुभव पर गमड नही करना चाहिए , जहाँ एक और हम सीखते है वही दूसरी और हमें ख़ुद भी सीकने की लालसा को अपने मन में कायम रखनी चाहिए तभी हम जीवन के सफर में कामयाब हो सकेंगे…

जब कभी आपको कोई कुछ सीखने की कोशिश करेगा तो जानते है ना आपको क्या करना है?
जी हाँ सीखना और सीखाना है परन्तु ध्यान रहे अच्छी सीख जीवन के अन्धकार को मिटा कर प्रकाश लाती है वही बुरी सीख प्रकाश को भी अंधेरे में परिवर्तित कर देती है…




लेखिखा
दिव्या

Sunday, December 6, 2009

यादें ...



अक्सर युहीं ख्याल आ जाता है , वोह बचपन सुहाना , वोह दोस्तों की मस्ती और उनका याराना ! जैसे जैसे ज़िन्दगी के पड़ाव में आगे बढ़ने लगे वैसे वैसे सुहाने पल यादों में तब्दील होने लगे , मनो कल ही बात थी जब हम साथ बैठ कर बातें किया करते थे , साथ मिलकर खूब सारी मस्ती किया करते थे... वोह बारिश में भीगना , नाव बनाना , स्कूल के रूल तोड़ना , अध्यापिका की डांट खाना, चुप चुप के क्लास में लंच करना... अब तो सब यादें रह गई है और जो पल अब गुज़र रहे है वोह भी कल यादें बन कर रह जाएँगी...

वक्त कितनी जल्दी आगे बढता है ना , ये साल अभी शुरू ही हुआ था मनो और ख़तम भी होने को है...हल पल अपनी मुट्टी में कैद करने को जी चाहता है! हर लम्हों को तस्वीर में कैद करने को जी चाहता है , ताकि कोई भी पल ज़ेहन से निकल न जाए ...

कभी कभी इन खूबसूरत पालो को यादें बनता देखती हूँ तो बहूत डर लगता है , कहीं ये पल रेत की तरह हाथो से सरकते हुए ,हमें अकेला ना छोड़ दे , पलके झपकते ही कही आँखों से ओजल ना हो जाए...

पर लम्हों को यादें बनने से कौन रोक पाया है... बस इसी कोशिश में हूँ की हर पल को सितारों से जगमगा दूँ ताकि जब ये यादें बन कर याद आए तो अपने साथ मुस्कराहट को साथ लाये और मन में नई ताजगी भर जाए...

शुक्रिया दोस्तों मुझे ख़ुद से मिलाने के लिए और मुझे अपना सबसे प्यारा दोस्त बनाने के लिए...

लेखिखा
"दिव्या"

Wednesday, November 11, 2009

जिन्दगी इसी का नाम है ..

आज मैं जल्दी उठ गई थी रात भर नीद से सो नही पाई रोज़ मर्रा की जिन्दगी से तक गई थी शायद और कुछ संतुस्ठी जनक ना कर पाने की ललक ने मनो मुझे कमजोर बना दिया हो

फ़िर मैं उठ kar युहीं बाहर खुले आकाश की और देख रही थी, अब दिल्ली में ठण्ड बदती जा रही है। सुबह क लगभग ६.३० बजे थे और हल्का सा कोहरा चाय हुआ था और थोड़ा अँधेरा सा हो रहा था ॥ सुबह सुबह चिडियों की चेचाहत मन को अक सुकून एक आनद दे रही थी मन तो मेरा भी कर रहा था की उन् चिडयों के साग मन भी सुर सुर मिलों पर रूक गई की कही मेरी आवाज़ सुन कर वो कही भाग न जाए ! फ़िर धीरे धीरे दिन निकलने लगा सूरज की हलकी हलकी लाल किरण आकाश में फैलाने लगी और सूरज बदलो के पीछे से होते हुए आँख मिचोली सा खेलता हुआ प्रतीत हो रहा था॥

सुबह सुबह के सुंदर दृश्य को देख मन बहूत खुश था आज सुबह और सोचा की कहीं घूम के आ जाती हूँ इसी बहने थोडी कसरत भी हो जायेगी॥ दिल्ली की भाग दौड़ भरी जिन्दगी में कसरत के लिए वक्त निकाल पाना बहूत्मुस्किल है ऊपर से आजकल ये फास्ट फ़ूड तो जल्दी हमें बूडा और कम्जूर बना देंगी...

युहीं चलते चलते रास्ते में अक गाये दिखी वोह अपने प्यारे से बछडे को सहला रही रही॥ आगे बड़ी तो देखा कुछ बच्चे स्कूल की बस कई इंतज़ार कर रहे थे और सुबह सुबह की ठण्ड से खुदको बचने के लिए हपने हाथो को मल मल के अपने गालो पे लगा रहे थे , उनको देख मुझे मेरे बच्चपन याद आ गया जब हम भी भरी बर्कम बसता उत सुबह सुबह स्कूल को जाया करते थे...

थोड़ा और आगि बड़ी तो एक चाय वाले की दूकान पे लोगो की बीद देखी लोगो की जो बस कई इंतज़ार करने के साथ चाय और समोसे कई आनंद ले रहे थे ... हाँ वैसे भी ठंडी के महीनो में भला कौन जल्दी उत्ता है जो अपने लिए नाश्ता बना सके और दिल्ली जैसे सेहर में जयतर लोग बहार से आए हुए है यहाँ काम करने के लिए और वोह सब बहार के खाने पे ही निर्भर है... और ऊपर से ये महंगाई मार ही डालेगी ..।

जैसे जैसे आगे बड़ी तो अक मोची दिखा जो लोगो को बुला बुला कर उनसे कह रहा था "भाई साहब पोलिश करा लो " उसकी हालत देख बहूत दुःख हुआ शायद बहूत तंगी थी उसको , उसको देख मन पसीज उठा !!

आगे एक मन्दिर दिखा वहां पर बहूत सारे लोग आए हुए थे बहूत से तो ऐसे शारीरिक रूप से असमर्थ थे और कुछ के आखो मा आँसू की धार साफ़ दिखाई दे रही थी॥ शायद सब भगवान के घर अपनी अपनी फरियाद ले कर आए थे॥ उन् सब के सामने मुझे मेरी तकलीफ और दर्द मनो कुछ भी नही लग रही थी और समाज ही नही आ रहा था की मैं भगवान् से मांगू तो क्या मांगू ?

बस भगवान् जी के आगे हाथ जोड़ कर वापस घर की तरफ़ लौट पड़ी और ख़ुद की काफ़ी हद्द तक सुकून की साँस लेते देखा की लोगो की पास इतनी तकलीफ है जिसके आगे मेरी तकलीफ तो कुछ भी नही और इसी बात को दिल में रख कर घर की और लौट गई मन में एक नई ताजगी लिए...

शायद इसी का नाम जिन्दगी है...

लेखिखा
"दिव्या"

Tuesday, November 10, 2009

दिल्ली - हाई फाई हो गई है

आज कल दिल्ली हाई फाई हो गई है, जहाँ एक और महगाई बड़ती जा रही है वहीँ दूसरी तरफ़ कॉम्मन वेअल्थ गेम क चलते आए दिन दिल्ली में नए नए परिवर्तन होते जा रहे है,,,

आज कल दिल्ली का सफर इतना महंगा हो गया की मनो ये दिल्ली नही हो कोई विदेश हो॥ पर महगाई के साथ साथ सर्विस भी अची होनी चाहिए की नही ?? पर सर्विस के नाम पर कुछ नही....

इतने सालो में मैंने महगाई को कभी महसूस नही किया या मुझे कभी परवा नही रही थी पर जब से बसों का किराया बड़ा मनो पहली बार मुझे महगाई का असली महत्व पता चला ॥ दिल्ली सरकार ने डीटीसी के हानि के चलते बसों का किराया बढाया पर ये बात समाज नही आई की उन्होंने प्राइवेट बसों को क्यूँ अनुमति दी बसों का किराया बढाने का ?? ( शायद इसलिए की अगर सिर्फ़ डीटीसी का किराया बढेगा तो कोई उसमे सफर नही करेगा ) पर अपने नुक्सान के चलते दूसरो पर अपना बोझ डालना कहाँ तक फायेदे मंद है ?

दिल्ली में लगभग ४०% से जायदा लोग ऐसे है जो प्राइवेट कंपनियो में काम करते है और उनमे से ३०-३५ प्रतिशत ऐसे लोग है जिनकी मासिक आए केवल ४००० -५००० महिना है॥ और उनकी आदि सेलरी बस के किराये में लग जाती है वोह क्या खायेंगे क्या बचायेंगे ? क्यूँ सरकार ये नही देखती है क्या उनकी आँखों में परदा डाला है या वोह चाहती ही नही है दिल्ली में गरीब लोग भी रहे ???

मुझे याद है जहाँ आज १५ रुपये किराया लगता है वहीँ जब मैं ८ साल की थी तब १ रुपये किराया लगता था ! कितना महगाई हो गई है दिल्ली में ?

मैं बस सरकार से ये कहना चाहती हूँ अगर वोह महगाई बड़ा रही है तो लोगो की मासिक आय को ध्यान में रख कर बदाये । इस तरह महगाई बढाने से लोगो की जीविका चलाने में बहूत गहरे प्रभाव पड़ता है ... सरकार क्या बनाना चाहती है दिल्ली को ?

क्या दिल्ली जैसे शहर में एक आम इंसान रह नही सकता ??
सच में अब तो ऐसा लगता है कुछ सालो में या कुछ महीनो में दिल्ली हाई फाई हो जायेगी ....

Monday, November 9, 2009

मेहनत करने वालो की कभी हार नही होती !

मेहनत करने वालो की हार नही होतीये वाक्या तो आप सब को बलि बांती स्मरण होगा बस इस पर कुछ लिखने की कोशिश की है...

सच कहा है किसी ने मेहनत करने वालो की कभी हार नही होती पर महेनत तभी रंग लाती है जब आपको अपने किए गए काम पर पूर्ण रूप से विश्वास हो, जी हाँमहेनत साथ अपने किए गए कार्य पर विश्वास होना भी अति आवश्यक है !!

मेरी एक अद्यापिका ने एक बार मुझे यही सीख दी थी जब मैं उनके दिए गए कार्य को याद कर रही थी , और उन्होंने आकर मुझे सराहा और कहा तुम इस बार कक्षा में अवस्य ऊथिर्ण करोगी और कहा की मेहनत करना ही काफ़ी नही है बल्कि अपनी मेहनत पे विश्वास करना भी उतना आवश्यक है क्यूंकि अगर अपने काम के प्रति विश्वास नही रखोगे तो वोह आपकी अंदर से कोकला बना देगी अआपकी उन्दरुनी सकती को कम्जूर कर देगी जिसके परिणाम सवरूप आपको हार का मुह देखना पड़ सकता हैहाँ विश्वास करने से तात्पर्य ये नही की तुम गमंड करो आपने काम पर, अपनी महेनत पे

लोग अकसर मेहनत करने के बाद भी डरते अगर मैं फेल हो गया तो ? अरे ! जब तुमने सच में मेहनत करते हो तो फ़िर डर किस बात का ? अगर फेल हो गए भी तो हमें हार नही मानना चाहिए क्यूंकि हार इंसान की चुनोतियों से लड़ने के लिए परिपक्व बनता है , जैसे एक हिरा को तराशने में मेहनत लगती है उसी प्रकार ख़ुद की तराशने में भी मेहनत लगती है ...

अब से जब भी आप मेहनत करे बस ख़ुद पर विश्वास रखे , उस ऊपर वाले ( खुदा ) पे विश्वास रखे और महेनत करते रहेसफलता आपके कदम जरुर चूमेगी

बेस्ट ऑफ़ लख !

लेखिखा
"दिव्या "


Tuesday, October 27, 2009

पहचान !

क्या आप अपने आप को पहचानते है ? नही ? तो फ़िर क्यूँ हम दुसरो को जानने पहचानने में अपना अधिकतर वक्त जाया करते है ?

कई बार ऐसे हालत उत्पन होते है जिन्दगी में जहाँ हम अपने आप में ही उलज कर रह जाते है और सही ग़लत का फ़ैसला दूसरो पर छोड़ देते है॥ जिन्दगी हमारी और फ़ैसला किसी और का? ये कैसा हिसाब है ?

जिन्दगी में अक्सर हम भी दुसरो को समजने और उनकी जीवन की उल्जनो को सुल्जाते सुल्जाते ख़ुद अपने आप से अपरिचित हो जाते है ॥ और तो और आज कल समाज में सभी वर्ग के लोगो में एक दूसरे से आगे निकलने की होड़ ने सब इतने खोये है की सायद की ख़ुद को समजने या जाने का किसी का पास वक्त भी बाकी है? अब तो हालत ऐसे है की सब लोग बस यही सोचते है की जो हो रहा है होने दो यारो कौन ज्यादा दिमाग कर्च करे और बेकार के जन्जतो में पड़े... यहाँ तक की किसी को ये भी परवा नही की उनकी जिन्दगी का मुक्य उद्देश्य क्या है? और उनको किस राह में जाना और क्या सही और क्या ग़लत है॥

इस बात पर एक बात याद आ गई ...:- एक बार मेरी फ्रेंड का भांजा घर आया हुआ था और इसकी उमर लगभग २ वर्ष की थी। तो वोह अपनी मस्ती में बालकनी की और जा रहा aur सामने से मेरे भाई आ रहा था और उसको जरा सी टक्कर लग गई और उसकी दिशा बदल गई किचन की और..तो उसने किचन की और बढना शुरु कर दिया और किचन से मेरी मम्मी बहार आ रही थी और फ़िर उस्सको टक्कर लग गई और उसकी दिशा फ़िर बदल बेडरूम की और और वोह बेडरूम की और चलने लगा...

इस कहानी से मै बस यही समजने की कोशिश कर रही हूँ की आज कल सब लोगो की हालत भी उस बच्चे के सामन हो गई है॥ जो जहाँ ले चले वोह उसी और चलने लगता है...ऐसे मै समाज का भी बाला नही होता और इंसान ख़ुद की पहच्चन खोता चला जा रहा है... ऐसे मै आप सब देखते ही होंगे की कल जो संस्कार हमारे पूर्वजो ने दिए थे वोह आज न क बराबर रह गए है॥ परवर्तन अनिवार्य है पर परविर्तन का मुकोटा पहन हम सच्चाई से तो नही भाग सकते न? सारी दुनिया से ख़ुद की बुरइयो को छुपा लोगे पर क्या कभी एकांत मै ख़ुद का सामना कर पाओगे ? सिर्फ़ इसका एक ही उत्तर है नही नही और सिर्फ़ नही !

इसलिए सबसे से पहले ख़ुद को समझो ख़ुद को पहचानो की तुम कौन हो ? तुमारा मजिल क्या है ? क्या जो तुम कर रहे हो वोह सब के हित मै है ? तुमरे कर्तव्य का है ?

ऐसी ही कई सावाल है जो ख़ुद से पूछोगे तो हर एक सवाल का उत्तर अपने आप ही सामने आ जाएगा॥ जो तुम्हें तुमरे अन्तेरात्मा से मिलाएगा और तुम सही मायने मा चैन की साँस ले सकोगे...

हमारी पहच्चान ही हमारा अस्तित्व है !

लेखिखा
"दिव्या"

Saturday, October 10, 2009

बछडा - एक सची घटना !

कुछ दिनों पहले की बात है युहीं रास्ते से गुज़रते हुए मैंने अक बछडे को देखा जो अपनी माँ की गोद में बेठा हुआ था और उसकी माँ उसको प्यार से सहला रही थी ॥

जैसे जैसे मैं उनके करीब गई देखा वोह मासूम बछडा पुरी तरह खून से लतपत था और उसकी माँ उसको पुचकार रही थी॥ उसकी ये दशा देख कर ऐसा व्यतीत हो रहा था मनो कोई गाड़ी वाला उसको मार कर गया हो... उस व्यक्ति को इस मासूम पर दया भी नही आई होगी ॥

शायद आज की दुनिया में इंसान, इंसान की परवाह नही करता उस दुनिया इंसानों से बेजुबान जानवर के लिए दया की उम्मीद करना शायद ख़ुद की नासमाजी होगी।

उस मासूम बछडे का दर्द मनो मेरे मन में उस व्यक्ति क प्रति करोड़ उत्पन कर रहा था और वहीँ दूसरी और उस बछडे का दर्द और उसके माँ की पीड़ा मेरे मन को कम्जूर कर रही थी... बछडे की माँ अपने बच्चे को गोद में लिए उसकी आंखिर साँसे गिन रही थी और अपनी ममता भरी आँखों से अपने बच्चे के दर्द को महसूस कर उसके दर्द को कम करने की नाकाम कोशिश कर रही थी और मनो उसका मासूम बछडा अपनी माँ से बिछड़ने के गम को मन में दबाए अपनी माँ को सान्तवना दे रहा हो॥

ये ख्याल एक का एक मन में उत्पन होने हो रहे थे॥ समाज नही आ रहा था की क्या करूँ या क्या ना करूँ॥ फिर मैंने टेलीफोन डायरेक्टरी में डायल किया और उनसे एनीमल केयर वालो का नम्बर लिया और उनको फ़ोन करके बुलाया ॥ उनको आते आते लगभग आदा घंटा हो गया था और ऐसे में उस बछडे की हालत और कराब हो रही थी॥ गाये ने अपने बच्चे को और कस कर पकड़ रखा था मनो अभी वोह रो पड़ेगी ॥ उसकी आँखों से ऐसा साफ़ व्यतीत हो रहा था ॥

लगभग आदे घंटे बाद एनीमल केयर वाले आए और उस मासूम बछडे को उठा कर ले जाने लगे और उसकी माँ उनको ले जाने से रोकने की कोशिश करने लगी इस दोहरान २-३ बार उस एनीमल केयर वाले व्यक्ति को भी हाथ मा करोचे आ गई... ॥

पर उस का माँ की पीड़ा भी कम नही थी॥ ऐसे वक्त में अक माँ का साथ जरुरी होता है पर मैं उसकी ( बछडे ) की जान बचने की कोशिश में उसको उसकी माँ से दूर कर रही थी॥ शायद अभी उसकी जान बचाना जायदा जरुरी था॥

वोह उस बछडे को उठा कर ले गए और उकसी माँ उस गाड़ी की और की ताकती रही ....

उस माँ को तनहा छोड़ मैं भी घर की और निकल पड़ी ॥ मन में अक अजीब सा एह्साह लिए की क्या फ़िर वोह माँ बछडा मिल पायेगे॥ पर शायद जब मिलेंगे तो उसकी माँ के मन में होने वाली खुशी अनमोल होगी.....

लेखिखा
"दिव्या"

Friday, October 9, 2009

जिन्दगी के उतार चडाव में कभी हार नही मानना !

जिन्दगी बहूत खूबसूरत है हो सके तो कभी मन की आँखों से देखना!

जिन्दगी में हर किसी को उतार चडाव देखने को मिलते है हर बार मन् हारता हुआ सा नज़र आता है ना चाहते हुए भी मन में उठने वाले ख्याल मन में हलचल पैदा कर देते है जो हमारे अंतर्मन को कमजोर कर देता है मनो लगता है है दुनिया में हमारा कोई अस्तित्व नही है हमसे कोई खुश नही है॥

ऐसे ख्याल मन् को अक्सर दुविदा में डाल देते है की क्या करे या क्या ना करें, एसे वक्त में अच्छा सोच पाना मुस्किल सा लगता है , जो हमरे मन को अन्द्कार से निकलने नही देते और अपने में धीरे धीरे समा लेते है ॥ ऐसे हालत में मन पे काबू पा लेना मतलब अपने मन को जीत लेना होगा॥

हम हमेशा जिन्दगी में अच्छे और बुरे दोनों काम करते है और जब भी मन में ऊपर कहे गए हालत उत्पन हों तो आप उन् खूबसूरत लम्हों को याद करे जिसके कारण आपके चेहरे पे हसी आई हो, उन् लम्हों को याद करे जब आपके कारण किसी के आंसूं को आपने एक खिलखिलाती मुस्कराहट दी हो, उन् खूबसरत लम्हों को याद करें जब पुरा दिन बिताने के बाद आपने रात में चैन की साँस ली हो , उन् लम्हों को याद करें जब किसी ने आपकी प्रसंशा की और किसी को आपकी जरुरत पड़ी हो...

यकीन करें ये सारे लम्हे आपके मन में एक नई उमंग एक नई ताज़गी भर देंगे और आपको जीने की एक नई राह देंगे और सच माने दुःख के पल क्षण में दूर हो जायेंगे और खुशिया आपके कदम फिर से चूमेगी...

एक खिल्किलाती मुस्काराहट आ जायेगी आपके लबो पे उन् सुंदर लम्हों को याद करें, और वैसे भी किसी ने कहा है ना मुस्कराहट हर गम को दूर कर देती है :)

तो अगली बार जब भी आपका मन विचलित हो आप मेरी इन् बातो पे गौर फरमाइयेगा !!

उसी खूबसूरत मुस्कारत के साथ फ़िर लौटूंगी अपनी नई पोस्ट लेके !

लेखिखा
"दिव्या"

Sunday, October 4, 2009

जिन्दगी

जिन्दगी शब्द अपने आप में एक पहेली है जिससे समझ पाना एक आदमी के बस में नही...

जिन्दगी एक अनकहा खवाब है जो ख़ुद में अनेक रंग समेटे हुए है, कुछ खुशी के रंग, कुछ गम के रंग और कुछ ऐसे एहसास जो भुलाये नही बुले जाते है॥

जिन्दगी एक समुन्दर की लहर है जो आपको छु कर जब गुज़रती है तो मनो एक ख़ूबसूरत एहसास आपके ज़हन में भर जाती है, और इन लहरों के जितने करीब जाओगे उतने ही उसमे समाते जाओगे ...

जिन्दगी एक दिया है जो अपने में एक गहरे अंधेरे को समेटे हुए है... जैसे लहरें अपने में सब कुछ समेट वैसे ही जिन्दगी की रोशनी आपको खुशिया तो देती है और इससे जितना जाने की कोशिश करोगे येया अन्देरे गलियारों में ले जायेगी जहाँ से निकल पाना मुस्किल है ॥

जिंदगी में कई बार ऐसी बातों का सामना करना पड़ता है जिसका कारण तो हमें मालूम होता है मगर जवाब नही होता॥ उन सब बातों का हमारे जीवन, हमारे अस्तित्व पर बहूत गहरा प्रभाव होता है॥

कुछ लाइन अर्ज़ कर रही हूँ :-

जिंदगी हर पल करवट बदलती है ,
कभी साथ तो कभी दूर चलती है .
बदलती हुई जिंदगी मेरी ,
मेरे जीवन की बंदगी हो गई है
हाँ अब तो आदत सी हो गई है ...



लेखिखा
"दिव्या"

Friday, October 2, 2009

Begger - भिखारी

मेरा जन्मदिन था, दोस्तों के साथ खूब मस्ती करने के बाद मैं घर को रवाना हुई और बस में बेठ गई और बस के शीशे से सर टेक कर बेठ गई !

काफ़ी थक चुकी थी इसलिए मैंने थोडी देर के लिए आँखे बंद कर ली और ऐसे ही पुरे दिन की बातें सोच रही थी ! फ़िर थोडी देर में बस चलने लगी कुछ देर बाद बस एक बस स्टाप में रुखी और मेरी आँख खुली ॥ वहां से एक भिखारी बस में चडा और उसके हाथ में अक सितार था , फ़िर उसकी तरफ़ देखा मैंने और फ़िर शीशे पर टेक लगा लिया मैंने ... बस में रेडियो बज रहा था और थोडी देर बाद बस वाले ने रेडियो बंद कर दिया और एक बहूत प्यारी सी मधुर सी धुन बंजने लगी मेरी आंखे फ़िर खुली और देखा वोह भिखारी वोह धुन बजा रहा था

वोह इतना मधुर धुन बजा रहा था की बस में बेठा हर व्यक्ति उसकी धुन का आनंद ले रहा था । उसके सितार से निकली हर धुन मेरे पुरे दिन की थकन को दूर कर रही थी। और मनो ऐसा लगा की शायद वोह अपनी धुन में कह रहा हो " देखो मेरी हालत क्या है मेरी दुनिया क्या है और फ़िर भी मुझे किसी बात का दुख नही मेरे पास कला है जो मेरे जीने का जरिए है फ़िर भी लोग मुझे भखारी कहते है ''

वोह भखारी किसी की तरह नही देख रहा था वोह बस अपनी धुन बजा रहा था और मनो वोह अपनी ही धुन मा खोया हो... उसकी इस अनमोल कला को देख कर लग रहा था की उसके सामने मैं कुछ भी नही...

बस में बेठा हर व्यक्ति बिना उसके मांगे ही उसको अपनी मर्ज़ी से रुपये दे रहा था । येया भी नही की एक या दो रुपए बल्कि शायद ही किसी ने उसको पाँच रुपए से कम रुपये दिए हो॥ मनो उसने मेरे बर्थडे गिफ्ट दिया हो थो मैंने भी ख़ुद से ग्यारा रुपए निकाल कर उसको दिए !

फ़िर कुछ देर बाद लोग उससे अपने मन पसंद की धुन बजा रहे थे और वोह उस्सी बेहतरीन कला से सब की फरमाइश कर रहा हो॥ वोह थो सच में मेरी नज़र में अक रॉक स्टार था !

फ़िर मेरा बस स्टाप आया और मैं बस से उतर कर घर को जाने लगी , पर उस व्यक्ति की धुन अभी तक मेरे कानो में गूंज रही थी !

अब लग रहा था की क्यूँ इतनी कला से निपूर्ण होने के बाद भी लोग उसको भिकारी क्यूँ खेहते है क्या कोई नही जो उसको एक मुकाम दे सकता !

कुछ लाइन अर्ज़ कर रही हूँ इस घटना पर ...

जिन्दगी वक्त मांगती है ,
तरक्की को एक नई राह देने क लिए ,
इंसान उसी राह पर लगा देता है लगाम,
दुसरे को रुला, अपनी खुशी पाने के लिए !!

लेखिखा
"दिव्या "

Monday, September 28, 2009

Yoindia.com / Yoindia की कुछ कट्टी मीती बातें

Yoindia मेरी जिन्दगी का अक हसीन हिस्सा है जिसे मैं चाह कर भी ख़ुद से दूर नही कर सकती हूँ! हर एक पल यहाँ पर गुज़ारा हुआ एक खूबसूरत खवाब है, जो मुझसे मेरी जिन्दगी से इस कदर जुड़ गया है की शायद अब बयान करना मुस्खिल सा लगता है! योइनिडिया युहीं हमेशा खिलखिलाता रहे बसी यही दुआ करती हूँ!

कितने ही उतार चडाव आए योइंडिया में पर आज भी यहाँ वोह महक अब भी बाकी है ! यहाँ से मुझे बहूत कुछ सीकने को मिला , नए दोस्त मिले , नई-२ बातें सीकी , नए रंग देखे दुनिया के और थो और हर सपना मैंने अपने अल्फाज़ से सजाया !

ना दिन की परवाह या शाम की परवाह , यहाँ मस्ती में डूब कर सब इतने खो जातें है की वक्त का पता ही नही चलता ! आज की बात ही देख लो॥ सुबह के ९.३० बजे से ऑनलाइन हूँ यहाँ पर और अब इस वक्त रात के ९ बजने को आए है...कब दिन शुरू हुआ और कब रात हो गई पता ही नही चला !

बहूत सारी कटती मीटी यादें है , यहाँ हम सब अक परिवार की तरह है जहाँ लड़ना ,मानना, चिलाना , और बहूत सारी मस्ती करते है॥

बस ये कारवां युहीं आगे बढता रहे हमेशा हमेशा .......

लव यू योइंडिया॥

दिव्या